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मासुक-ए-हिज्र

वो मिलते ही नहीं अब क्या ये गम कम है,
बातें तो मिट्ठी है मगर आदमी बेरहम है।
बसे है कई और तस्वीर उनके आंखों में,
हमने तो समझा था कि केवल हम है।
आसना था जिनका गर्दिश में अब तक,
कोई दुसरा नहीं था वो शख्स हम हैं ।
फिर भी रूसवा हो गए वो न जाने क्यों,
उनके इंतज़ार में अभी तक मेरी आंखें नम है।
©anuragrahi