भारती की छवि अभिराम कर लें,
आओ मातृभाषा को प्रणाम कर लें।
अज्ञानी से ज्ञानी तक करे ये सफर,
देववाणी संस्कृत है इसका घर।
भाषा ज्ञान सद्भाव मिलता यहीं,
रामायण जैसा क्या राम हैं कहीं।
वाल्मीकि जी को राम राम कर लें,
आओ मातृभाषा को प्रणाम कर लें।
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©vikasgarg
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