तन के हर पुर्जे को सहलाती
यह माया जग में अपने रंग है बरसाती
कदमों को जमी पर रखने से पहले ही
मखमली अहसास है कराती
और पृथ्वी से मिलन में बाधा बन जाती
जल की तृप्तता को बंधित कर पहुंचाती
और नदियों की कलकल से हमें ये दूर ले जाती
निर्मलता को सरलता से हमसे है छुपाती
यह माया बेरंग को भी रंगीन है दिखलाती
वायु की पवित्रता को मिश्रित करती है जाती
और प्राणों को चपलता से अपने नियंत्रण में लाती
वन-उपवन मे बहती वायु को,
कोशिकाओं के लिए दुर्लभ है बनाती
धीरे-धीरे यह रिक्तता को भी भारीपन से ,
आच्छादित करती है जाती
और मन शरीर को बेबुनियादी धागों से,
सिले वस्त्र है पहनाती..................................
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