धीरे-धीरे यह रिक्तता में भी अपने उपकरण है जमाती
और मन , शरीर को बेबुनियादी धागों से ,
सीले वस्त्र है पहनाती
और आकाश की विशालता को ,
अंधकार से अपने कण रूपी सूक्ष्मता में ,
बदलने में देर ना लगाती
सूर्य के प्रकाश में भी ये रासायनिक आवरण है चढ़ाती
और ऊर्जा की दिव्यता को छिछले प्रकाश में रूपांतरित करती है जाती..................
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