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मैं अब वो थिरकता मन छोड़ आया हूँ ।

मैं अब वो थिरकता मन छोड़ आया हूं
बात बात पे बरसता सावन छोड़ आया हूँ।
मैं उस दहलीज पे हूं जां खुशी-ओ-ग़म की गुंजाइश नहीं
मोम की तरह दिल का पिघलन छोड़ आया हूँ ।
मेरे पिछे पिछे अब मत आओ मेरे नुमाइशी परिंदों
लफ्ज-ओ-अल्फाज की अदा-ए-बाँकपन छोड़ आया हूँ ।
गुल-ए-गुलशन भी अब मेरे निगाहों को उलझा नहीं सकता
गंध-ए-गुल के पिछे का पागलपन छोड़ आया हूँ।
मैं जहाँ भी रहूं जैसे भी रहूं किसी को क्या मतलब
मैं अपने कल,आज और अतित का चिंतन छोड़ आया हूँ।
©anuragrahi