मैं ऐहसान के बदले ऐहसान को ऐहसान नहीं कहता
फकत बचपन के मिले नाम को पहचान नहीं कहता।
वैसे तो हर रोज़ मेरे घर आया जाया करते हैं लोग
रोज़ आने जाने वालों को मैं मेहमान नहीं कहता।
हमने घर में बहुत सारे जुटा रखें है जरूरत के समान
मगर रुखसती में साथ न जाए उसे समान नहीं कहता।
मुझे बहन नहीं सो नहीं समझ पाया मतलब-ए-कुर्बान
अपने खुसासारी को कभी किया कुर्बान नहीं कहता।
मुकम्मल है सभी के लिए कहीं न कहीं कब्र की जमीं
मगर कब्र से रूह आवाज न दे उसे श्मशान नहीं कहता।
©anuragrahi
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