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मैं ऐसा क्यों हूं

कभी-कभी
दिल में ख्याल आता है
मैं औरों से जुदा क्यों हूं
विचारों में, व्यवहार में
मगन अपने अंतर के संसार में
कथित दुनियादारी से दूर
दुनियादारी पर्याय दिखावे का
सबको देना डोज पर डोज़ भुलावे का
अंतर्मन में
संघर्ष अनवरत
कर दें इसको उसको सबको
अपने सामने कैसे नत
ये बढा, खोद दो गड्ढा
इसके पास वैभव बढकर
पर नींदा के अनगिनत मकसद
नींद नहीं चैन नहीं
इनकी शांति की कोई रैन नहीं
मन में जलन सामने मीठी बातें
यह रिवाज मुझे रास नहीं आते
धार्मिक दिखावे
खुद से और समाज से
बड़े बड़े छलावे
राजनीति के चक्कर
आधी जिंदगी में माननीयों के भुलावे
जर्जर होती मानसिकता
की दुकानदारी
सब जुते हैं
सब बाखबर होकर भी
अनायास ही बेखबर लुटे हैं
अपनी कोई सुध नहीं
माननीयों के सांसों की गिनती
दुनिया को बता बता कर
बेमकसद महत्वहीन बातों में
शांति ऊर्जा और समय की फजीहत कर
औरों को भी उलझाते
जो उलझा वो समझदार
जो निकला वो बेकार
मेरी समझ से परे है दुनियादारी
जीवन को गुमराह रखने की जिम्मेदारी
मैं अपनी नादानी में खुश
मुझे नहीं भाता चरित्र का दुहरापन
बाहुबलियों और माननीयों का वंदन
पता है, गरीबों के लिए लड़ने वाले
जब बन जाते धनवान
तो कोई नहीं निकलने वाला शहीदों सा महान
फिर इनसे विमुख हो
क्यों न करूं समय बलवान का सम्मान
और इसमें रुकावट है यह जनप्रिय
दुनियादारी
सामने हों तो थोथे गाल बजाओ
परे हों तो उंगलियों से लगे रहो
मुझे नहीं समझ में आया
मैं सबसे अलग, ऐसा क्यों हूं
पर मैं शांत हूँ
अपनी ही मौज में मस्त
अपने आप में लीन
अपना खुद का
कुछ करने में तल्लीन
मैं ऐसा क्यों हूं, सबसे जुदा
©Krishna and YR Blogs
Self written