मै बता दूं तुम्हें कि कैसे जिना चाहता हूं
तन्हा पड़ गया हूं तेरा आसना चाहता हूं।
खता क्या हुई मुझसे जो खफा हो गई हो
तेरे सिने पर ये सर रखकर रोना चाहता हूं।
मुकम्मल नहीं कोई इंसां इस जहां में
राज़ की ये बात बस बताना चाहता हूं।
खुदगर्जों से पटी है यहां सारी ये दुनिया
फ़र्ज़-ए-इन्सानियत का बस निभाना चाहता हूं।
वफ़ा के इन राहों में सहने ज़ुल्म-ओ-सितम भी है
तेरे राह के एक एक कांटों को हटाना चाहता हूं।
अनुराग को कुछ करने के तौर-तरीके नहीं है
तुम्हीं से तो मिलने का इक बहाना चाहता हूं।
©anuragrahi
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