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मैं एक कागज का कश्ती हूं।

मैं एक कागज का कश्ती हूं।

मैं एक कागज का कश्ती हूं

मिट जाऊं अना पे मैं वो हस्ती हूं

यहां किसी का कोई दोस्त नहीं

मैं बेगानों का बस्ती हूं

कहीं नहीं यहां मेरा ठौर ठिकाना

बंजारों सा मैं एक गश्ती हूं

शाम-ए-गज़ल में पढ़ें जाने वाला

सुख़नवरों के हर हर्फ़ो का मस्ती हूं

कुछ दूर अनुराग अपने साथ ले चलो

अभी हालात से बहुत मैं पस्ती हूं।