मैं ही क्यों?
हर घड़ी, हर लम्हा, हर पलतेरी यादें मुझे घेरे रहती हैं,
तड़पाती हैं, जलाती हैं—
और तुझे खबर ही नही।
इस जलन में हर बार
सिर्फ मैं ही क्यों जलूँ?
जहाँ भी जाऊँ,
तेरी बातें, तेरी यादें
मेरे साथ चलती हैं—
मेरे जहाँ में एक चुभन बनकर।
इस चुभन का दर्द
मैं ही क्यों सहूँ?
जिंदा तो हूँ,
पर जी नहीं पाती हूँ।
भूलना चाहती हूँ कुछ देर तुझे
पर भूल नहीं पाती हूँ।
इस याद का हिस्सा
बस मैं ही क्यों बनूँ?
मेरी साँसों पर
तेरी यादों का पहरा है इस कदर,
कि हर साँस ऐसे लगती है
जैसे दम निकलता हो।
ये बेचैनियाँ, बेताबीयाँ,
मैं ही क्यों सहूँ?
बता ऐ बेखबर,
क्या तुझे है खबर—
कोई जीता है इस जहाँ में
सिर्फ तेरा होकर,
कोई मरता है हर घड़ी
तुझे सोचकर।
इस जहाँ मे तेरा होकर,
सिर्फ मैं ही क्यों रहूँ?
✍️शिवन्या