अब तक तो था भटक रहा ,
लेकर अपेक्षा उपेक्षा की बारात ,
बन अपने महत्त्वकांक्षा का दास ,
कल रात को मैं जाना ,
तूं कितना निश्छल कितना महान ,
ऐ चांद तुझे अर्पित मेरा श्रद्धा सुमन ,
तेरी चांदनी से सरोबोर हो ,
मैं भी हो गया निहाल ,
तन तो था ठिठुर रहा ,
नेह रागनी का था बरस रहा ,
पर मन हुआ हर्षित पुल्कित ,
जब नैना हुई तुमसे दो चार ,
अब समझ पाया हुआ ज्ञान ,
दूब सरसों सब सिहरे पड़े कैसे ,
फिर भी चेहरे पर नहीं कोई वेदना की छाप ,
पुल्कित हर्षित चेहरे कैसे इनके ,
होंठों पर सजे कैसे सिर्फ मुस्कान ही मुस्कान ,
कुमुद कामनी भी कैसे सुगंध बिखेरे ,
तोड़ अपनी सीमा की दीवार ,
मैं तो ठहरा जज्बाती ,
अब कैसे करूं इस एहसास को व्यां ,
पर हो चला मैं पुल्कित हर्षित ,
करके तुमसे आज साक्षात्कार ,
तन तो नश्वर है ,
फिर आनंद क्यों खोऊं ,
नश्ववर वेदना के साथ ,
अब तक तो था भटक रहा ,
लेकर अपेक्षा उपेक्षा की बारात ,
बन अपने महत्त्वकांक्षा का दास ,
ऐ चांद तुझे अर्पित मेरा श्रद्धा सुमन ,
तेरी चांदनी में मेरा अंतःकरण हुआ निहाल ।🤔
धन्यवाद 🙏
____संजय निराला ✍
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