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मैं जी रहा था किसी तरह गुज़ारा कर के।

मैं जी रहा था किसी तरह गुज़ारा कर के
तुझे क्या मिला इस तरह मेरा ख़सारा करके
वो तेरी अदा का मनचला दीवान रहा होगा
जिसने मुझे मोड़ दिया एक इशारा करके
मुक्तसर होती जा रही है तेजी से बिनाई मेरी
ग़म बढ़ा दी तूने और रकिब को इजारा करके
मैं ग़म-ख़्वार भी हूं मगर थोड़ा ग़मजदा भी
सबाब तुम भी ले लो तन्हाई में सहारा करके
वो मौलवी है हाफ़िज़ है शायद उनका हक़ है
फायदा देखना चाहता हूं मैं भी निकाह दुबारा करके
अब फकत लोगों से नहीं ख़ुद से भी चिढ़ आती हैं
जब से चली गई हो तुम मुझे बिचारा कर के
सुना है तुने शीशमहल बना ली वहां,रूक जाओ
मैं भी आता हूं ज़िम्मेवारीयों का निबटारा करके
न जाने तुझ तक मेरी ये सदाएं पहूंचते भी है या नहीं
बर्बाद कर लिया हूं मैं खुद को आवारा करके।
©anuragrahi