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मैं कैसे बताऊँ मैं कौन हूं तेरे लिए! मैं कैसे बताऊ

मैं कैसे बताऊँ मैं कौन हूं तेरे लिए!मैं कैसे बताऊँ?
रेत की चादर में लिपटा हुआ गिरा हुआ थका हुआ,
तेरी हर आहट को अपने धड़कनों में संजोता हुआ
जीवित हूं, मगर कैसे बताऊँ मैं कौन हूं तेरे लिए?
ये दुख सुख जिवन मरण भोग विलास हर्ष विलाप
ये सुबह ओ शाम दिन और रात प्रकृति की रचना है
सब कहते हैं मगर सब इस कड़वी सत्य को मानते नहीं
मैं समझने चला हूं कैसे बताऊँ मैं कौन हूं तेरे लिए?
हर रोज नईआंखें खोलता हर रोज़ कई आंखें बंद होता
रोज नए रिश्ते बनता हर रोज़ रिश्ते बिखरता देखता हूं
ये तन मन भी तो अभी तक उसी सुकून की तलाश में रहा
मगर खुद में खो गया कैसे बताऊँ मैं कौन हूं तेरे लिए! मैं कैसे बताऊँ?
©anuragrahi