कर एहसान ,
आज एहसान को तरस गई,
दे पहचान तुझे,
आज अपने पहचान को रो गई,
बड़ी ममत्व लुटा,
तुझको पाल पोस कर,
आज खुद ही तुम्हारे ,
रहमो करम की दास बन गई,
कर न्योछावर ,
तुझपर अपने ममता को,
आज खुद ही ,
दया को तक गई,
अब तो अदा कर ,
मेरे कर्ज को,
कर्ज देकर आज मैं ,
क्यों कर्जदार हो गई,
दे कर अस्तित्व ,
तुझे इस जहां में,
आज खुद ही इस दुनिया में ,
एक गर्भ की ,
हकदार भी ना रही ,
लुटा तुझपे हरदम ,
अपने रुप सौन्दर्य को,
आज भी सिर्फ ,
एक समान ही रह गई,
सोचती हूँ देख अपने ,
अतीत , भूत , वर्तमान को ,
सिर्फ यही पा आंखें भर आईं,
लुटी ही गयी,
छली ही गई,
बस अबला बन ,
शोषण का शिकार होकर रह गई,
कभी बालक बन ,
नोच खसोट की,
कभी प्रेमी बन,
छल प्रपंच का अंम्बार लगाया,
कभी पति बन,
अपने पौरुष का रौब दिखाया,
लेकिन हरदम बस ,
मै अपने पहचान को तरस गई,
आज तो शर्म कर,
कुछ तो रहम कर,
ऐ एहसान फरामोश,
अपने अस्तित्व के देनदार पर,
मुझको सिर्फ इतना बता दें,
मैं कौन हूँ,,,,?!!🤔
धन्यवाद 🙏
____संजय निराला ✍
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