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मैं लाडो, पराई की पराई ही रही

एक अजीब सी बात सदा से दिल में टीस करती आई थी,
मैं कब किसके लिए अपनी हूं ... कब किसके लिए पराई थी,
मैंने तो दिल से सभी को अपनाया था... जिसने जो रिश्ता मुझे बताया था,
दादा दादी की चहेती थी ....पापा की मैं परी थी,
भाई बहनों संग खेली, घर में सबसे मैं बड़ी थी,
प्यार में ही सही बचपन से ये बात मैंने सुनी थी....
सब सीख ले लाडो.. तुझे पराए घर जाना है,
अपने ही घर में मैं...किसी और की अमानत बन पली थी,
ना जाने किस आंगन जाएगी बिटिया - रानी...
ये सोच मां सदा से मन ही मन डरी थी,
चांद सी हुईं बड़ी मैं, बड़े धूम से डोली मेरी उठी थी,
शायद अब ये घर मेरा अपना होगा दिल में ये आस सी जगी थी,
हर रिश्ते को दिल से निभाऊंगी ...ये गाठ बांध आई थी,
दोनों घरों कि मान - मर्यादा साथ कंधों पर लाई थी,
पर...दिल टूट गया मेरा.....और आंखों में नमी थी,
जब यहां भी मैंने सबके मुंह से बात ये सुनी थी,
 दूसरे घर से आई है... ये तो पराई हैं 
मैंने तो हर रिश्ते को अपना माना था फिर,
मैं क्यों किसी की अपनी हो कर भी अपनी बन ना पाई थी?
क्यों हर बार मैं पराई थी?
एक अजीब सी बात सदा से दिल में टीस करती आई थी,
मैं कब किसके लिए अपनी हूं ... कब किसके लिए पराई थी ।।
©maahisingh