मैं प्रेम नगर का एक इंसां हूँ
फिर भी सबसे मैं तन्हा हूँ
कोई मेरे दर पर भला क्यों आए
दर दर अब जो मैं भटका हूँ
वो गुलनशी गुलबदन मुझे क्या जाने
कभी खुशबू बनकर मैं महका हूँ
आइना मेरे घर का अब है टुट गया
जिस आइने के आगे खुब संवरा हूँ
तेरे सभी पहेलियाँ है याद अभी तक
उन्हीं पहेलियों से तो आज तक मैं बहला हूँ