मैं रुका पथिक
कुछ कर जाने को
सबकी मंशा मैं भांप चुका
पर सब आये यहाँ जाने को
बूँदे बारिश की गिरती हैं
कि जाऐंगी वे सागर के पास
नए फूल खिलते हैं अनजाने ही
वे आये हैं मुरझाने को
मैं रुका पथिक कुछ कर जाने को
कुछ ने कण-कण बटोरा यहाँ
कुछ देखते रहे लकीरों को
सब कुछ न कुछ कहते रहते
पर तू रहा अब घर जाने को
मैं रुका पथिक कुछ कर जाने को
तेरा कहना ठीक सही
हर कोई पाले अरमान यहाँ
लेकिन वक्त छोटा है सबके लिए
क्या ये बात भी लगेगी समझाने को
मैं रुका पथिक कुछ कर जाने को
कुछ मिला नहीं अफ़सोस न कर
कुछ छूट गया बे-मौत न मर
सबकी अपनी मंज़िल है
कोई रुका नहीं यहां रुक जाने को
मैं रुका पथिक कुछ कर जाने को
©pank_ajs
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