मैं सोना चाहती हुँ
मैं सोना चाहती हूँ…
मैं सोना चाहती हूँ अपनी उम्र की सारी थकान मिटाकर,
सोना चाहती हूँ अपना सारा दर्द भुलाकर।
सोना चाहती हूँ अपनी पलकों पर रखी चिंताओं का भार हटाकर,
मैं सोना चाहती हूँ बरसों की बेचैनी को सुलाकर।
मैं सोना चाहती हूँ कुछ देर बस मैं होकर,
उस पल, उस वक्त, उस घड़ी में
सिर्फ खुद के साथ रहना चाहती हूँ।
मुझे नहीं चाहिए किसी की याद,
नहीं चाहिए किसी पीड़ा की कसक,
नहीं चाहिए कोई अधूरी ख़्वाहिश,
नहीं चाहिए कोई दर्द, परेशानी या सितम,
नहीं चाहिए कोई तड़प…
बस एक गहरी ख़ामोशी चाहिए,
जहाँ साँसें भी धीमे बोलें,
जहाँ दिल को समझाना न पड़े,
जहाँ आँखें बिना आँसू के बंद हो जाएँ।
मैं सोना चाहती हूँ…
भागकर नहीं,
टूटकर नहीं,
बल्कि खुद को फिर से पा लेने के लिए।
-शिवन्या
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