मैं तेरे हर मुरिदों का फरमान हो गया
तवज्जू दी तुने ये भी इक एहसान हो गया।
फकत एक कमरे की छत की साया थी सर पर
तुमने चाहा मुझे,साया सारा आसमान हो गया।
हम किस के लिए यहां दोजख में है आंसू बहा रहे
जाने वाले तो जन्नत का है इंसान हो गया।
तुम्हारी जुदाई ने इस कदर झकझोर कर रख दिया हमें
कि ये रूह इस जिस्म का चंद दिनों का मेहमान हो गया।
मैं किसी पहाड़ का इक शिल समझ रखा था खुद को
किस्मत से लुढका तो लहुलुहान हो गया।
हमारे दिल लगी के दिन तो कुछ अच्छे न थे अनुराग
फिर क्यूं ये अफसाना-ए-इश्क क़फ़स का रोशनदान हो गया।
©anuragrahi
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