मैंने लिखा है खूं से ख़त ये तुझको सनम
गहरे हैं दिल के घाव भरते नहीं ये जखम।
नज़र के सामने है तेरे चेहरे की परछाई सी
हो जाती है सुबह-ओ-शाम बेचैनी सी
कैसे हटाऊं मैं अपने दिल से ये भरम
मैंने लिखा है खूं से ख़त ये तुझको सनम।
कुछ भी करों ये दर्द मुख्तसर कर दो
चाहत पूरी मेरी सर-ब-सर कर दो
मेरे जिंदगी पर होगी तेरी ये बड़ी रहम
मैंने लिखा है खूं से ख़त ये तुझको सनम।
हिज़्र के ये दिन है फकत मेरे लिए शायद
तोड़ेंगी ये क़फ़स बस तेरी ही कवायद
दिल से पुछो है ये तेरी भी धर्म-ए-हरम
मैंने लिखा है खूं से ख़त ये तुझको सनम
गहरे हैं दिल के घाव भरते नहीं ये जखम।
मैंने लिखा है खूं से ख़त ये तुझको सनम।
©anuragrahi
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