N

★मौत से परे इन्सान कि पऱख★

फर्क नहीं पड़ता जहाँन को,
कुछ जमाने छुट जाने से।
जमाना रूठ जाता है वहीं पर,
रिश्तें ज़ुड जाते हैं जहां से।।
खुबसुरत होते हैं वह रिश्तें,
आपनों कि ख़ुशी जो जानते हैं।
उनकी मुस्कान के लिए,
खुद एक मजाक बन जाते हैं।।
'बस कुछ नही!' 'ठीक हैं!' तो,
लोग बातों-बातों में कह जाते हैं।
दर्द तो वह छुपाते हैं अक्सर,
जो दिल से दिल तक ज़ुड जाते हैं।।
पुरी होती नाहीं जरूरते,
कुछ अकेले रहकर भी।
बस रिश्तें बिग़ड जाते हैं,
अपनी जरूरत पुरी करने में।।
दिल से सम्भाले रिश्तों में,
गहरी बातों का कोई मतलब नहीं।
अक्सर दिल तूट जातें हैं वाहिपर,
गर वो कह दे 'हमे कुछ पता नहीं।।
हम अन्जान थे उस अन्जुमन से,
जो रूठी रहती है हमसे।
जब रूठ गया वो खुदा हमसे,
तो क्यूँ न खफ़ा होते उनसे।।
जिन्दगी से कोई गम नहीं,
गिला हैं इन्सान कि पऱख से।
भरोसा करते हम आँख बन्द कर जिनपर,
वही इन्सान ना जाने क्यूँ दिल तोडता हैं।।
©nilesh2016