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मेहरबानी उनकी जो दिल को रूठाए हुए हैं।

मेहरबानी उनकी जो दिल को रूठाए हुए हैं
इस तरह हमें वो सताए हुए हैं।
क्यों पर्दों में वो खुद को है रख रही
क़यामत वहीं तो ढाए हुए हैं।
कोई चाहने वाला तेरा न जाने कब आएगा
हम तो सुबह से तेरी राहों पर आंखें बिछाए हुए हैं।
अपने जज्बातों को नहीं इजाजत लबों पे लाने की
इस क़दर दिल में हम छुपाएं हुए हैं।
तेरी महफ़िल में जो आ कर है बैठ गए
तेरी मय से वो गम-ए-दो जहां का भुलाए हुए हैं।
ये अशआर यूं ही नहीं है दर्द की बनी
अनुराग!आप भी कहीं न कहीं चोट खाए हुए हैं।
©anuragrahi