चलते हैं हम अलविदा है दोस्त
मेरा आखरी सलाम तू क़ुबूल करना
ज़र्रे - ज़र्रे ने भी ठुकराया हैं मुझे तो
जरा सा तूने भी ठुकरा दिया तो क्या डरना.....
कोई बात भी नहीं फिर भी खफा है
ऐसी बातों मुलाकातों को भी क्या करना
दर्द तो बहुत है इस खिले बागपन में
लेकिन किसी ग़ाफ़िल को सुनाकर भी क्या मरना.....
दिल भर ही जाते हैं जब सब के जहां
तो किसी से दिल लगाकर भी क्या करना
यहाँ तो ईमान तक गिरवी रख जाते हैं लोग
तो जज़्बातों के निलाम हो जाने पर क्या जलना....
©deeprichu
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