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मेरा डर

क्यों अपने डर को मान नहीं लेती हूं
बहादूरी का चोला ओढ़े रहती हूं
हजारों की भीड़ में खोने का डर हो
तब भी क्यों खड़ी रह जाती हूं
लाखों आंखों में अपनी परछाई ढूंढनी पड़े
तब भी क्यों आंखे नहीं खोलती हूं
करोड़ों सवाल में दबी आवाज़ रह जाए
फिर भी क्यों बोलती रह जाती हूं
चुनिंदा हैं लोग आस पास मेरे
पर क्यों दूर हो जाती हूं
अपने डर को जानती हूं मैं
फिर क्यों उसे मान नहीं पाती हूं
©namrata05