बना है दीन का मसिहा हर तरफ़ ज्वहारात बांटे
कोई कह दे मेरे आंगन में भी आके बहार बांटे।
शिकन में हूं मैं विरान और मंजर भी यहाँ
यहां भी आके कह दो कोई कि प्यार बांटे।
ये हवा ये धूप की अपनी अपनी रवानी है
प्यासी धरती के लिए सिने से आसमां दो बूंद बांटे।
हमसुखन कोई भी रहे गर हमसफर न हो
अपने लहजे में होंठों से लबे जाम बांटे।
मेरे दिद में नहीं कूबत की अब देख सकू
अपनी आंखों से ही मुझे खुशी ओ जहां बांटे।
हर गली हर मुहल्ला है अनुराग का देखा सुना
गर नहीं देखा तो उसकी रौनक ए निगाह बांटे।
©anuragrahi
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