मेरे आंखों में एक फसाना है
ये दिल भी किसी का दिवाना है।
तेरे बग़ैर शब हमने कैसे गुजारी तन्हा
दर्द-ए-दिल हर एक मुझे बताना है।
कैसे मांगू मैं आसना इस जमाने से
यहां अदु सब मेरा बहुत पुराना है।
टुट रहा शिशे की तरह ये पत्थर दिल भी
सिलसिला मेरे साथ अब रोजाना है।
वो मुड़ कर भी एक बार नहीं देखती मुझको
मेरे कुचे मेंं मगर हर रोज़ आना जाना है।
मयकदे में ही सहर-ओ-शाम रहो अनुराग
वहां न किसी से रूठना न किसी को मनाना है।
©anuragrahi
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