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मेरे अरमान इस दिल में दबी की दबी रह गई।

मेरे अरमान इस दिल में दबी की दबी रह गई
शोख-ए-नजर उसकी मुझे देखती रह गई।
जब भी चाहा कहना अपनी दिल की आरजू
गर्द-ए-गम मेरे होंठों पर जमीं रह गई।
हालात ऐसे हुए ख़्वाब में भी न आया सुकून
इस कदर जिंदगी ख़ुद मुझसे रुठी रह गई।
बाजार में भी कोई खरिददार मेरा न मिला
मेरी किमत धरी की धरी रह गई।
वो चुरा ले गए मेरे जिस्म से रूह-ए-जीगर
और इक तस्वीर मेरी बेजान टंगी रह गई।
कोई चाहे भी तो अब पुरी नहीं होगी अनुराग
जिंदगी में कुछ ऐसी कमी रह गई।
©anuragrahi