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मेरे दोस्त अभी से तो तमाशा भी ना कर कोई

मेरे दोस्त अभी से तो तमाशा भी ना कर कोई
हस्र कर ऐसा आलम में जिसे देखे तो हर कोई
ये जो मैं हूँ जुदा होने लगा हूँ अब कि मौज़-ए-गम से
तू फिर से इक दफा अच्छा सा मुझमें जख्म भर कोई
बची है अब तो बस ये आलम-ए-तारीक ही मुझमें
था मुझमें जो कभी वो ले गया नूर-ए-क़मर कोई
कि ले के जान उसने छोङ जिन्दा ही दिया हमको
दफा इस कर गया अहसान हमपे इस कदर कोई
अभी गम ना मना 'हेमन्त' की इस दौलत-ए-गम का
मुकम्मल कर उसे भी रह गई हो जो क़सर कोई
गुमां इतना कि रौशन कर दे हम हर एक मौसम को
हुए ऐसे कि सावन में सुखा जैसे शज़र कोई
©kaliramana