मेरे गजलों में होते है अल्फाज़ कुछ और तरह की
तालिम-ए-हायात ही मिली है शायद और तरह की।
उनके याद से दिन-ब-दिन निखर रही है ये शायरी
गम तो है ही,खुशी भी है मगर और तरह की।
बादल आस्मां को घिरे होते है अक्सर काले काले
बारिश तो हो रहीं हैं पर इस दिल पर और तरह की।
ये आंखें भी न जाने क्यों हर वक्त लाल हो जाती है
यहाँ दुश्मन हैं ही मगर दोस्त भी है कुछ और तरह की।
उसके रूप सा एक हूर से मिला तो दिन कटने लगा
जिस्म-ओ-जां तो उसी की ही है सांसें है और तरह की।
बस यहीं तड़प यहीं मलाल दर-ब-दर भटका रही कि
रौशनी है मगर जिंदगी हो गई अनुराग की और तरह की।
©anuragrahi
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