मेरे गुलशन को फिर एक बार भिगाने आई
फिर ये बारिश मेरी तन्हाई चुराने आई।
शबनम की बुंदों की तरह गुलों के सर चढ़कर
जिंदगी में मोती के भाव मुझे बताने आई।
दिल में आहट सी हुई रूह में दस्तक सी उठीं
कोई खुशबु कहीं से मेरे सिरहाने आई।
है इक रस्क इस जमाने से अभी भी दिल में
सो रहा था निंद गहरी बेवजह क्यों जगाने आई।
मेरे सहर में दर्द-ऎ-वफा का इजाफा न कर
सौ बार ये बेवफाई है हमें रूलाने आई।
©anuragrahi
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