मेरे जिंदगी को राहत का कोई जाम न दो
मुसिबत की आदत है मुझे आराम न दो।
मुफलिसी में पला हूं नहीं है सुख की चाहत
ख़ुद को भुल जाऊं मैं ऐसा कोई ईनाम न दो।
दर्द-ए-दिल ही है ये मेरी अमानत अपनी
जुदा हो जाएं मुझसे वो खुशी का पैग़ाम न दो।
इश्क़ की राह पे चलना नहीं मुझे मुमकिन
सिख लिया है रहना तन्हा नया आय्याम न दो।
हर खता को मेरे अब नज़र अंदाज़ कर जाओ
जान ले लो मगर सर मेरे कोई इल्ज़ाम न दो।
क्या करोंगे फकत अनुराग का ये जिस्म लेकर
जिंदा लाश हूं मैं मुझे मुहब्बत का मुकाम न दो।
©anuragrahi
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