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मेरे खत अब अपने सिरहाने रख दो।

मेरे खत अब अपने सिरहाने रख दो
ना आने का सामने कोई मेरे बहाने रख दो।
तुम्हें फिर एक बार मुझे ऐतबार दिलाना होगा
अपनी दुख भरी किस्से पुराने रख दो।
शाम का वक्त है कुछ तो अजीज जरुर होगा
खुबसुरत लबों से अल्फाज़-ए-ग़म के खजाने रख दो।
मैं खुद-ब-खुद आ गया हूं मकतल पे
मुझे अपने तीर-ए-निगाह के निशाने रख दो।
ऐसे वादे न करो कि तुम निभा ही न पाओ
कुछ अनुराग के पास भी लम्हें सुहाने रख दो।
©anuragrahi