मेरे शहर का क्या कहें तेरे शहर में भी वहीं
आब-ओ-हवा सुबह-ओ-शाम की,है और भी खराब।
फलक से अब क्या कभी अमृत के दो बुंद गिरे
धरती की आंचल जब हो गई,मैला और भी खराब।
है नहीं यहां कोई किमत खुन-ए-जिगर की
वहसी हो गए हैं लोग और,जानवर और भी खराब।
जिने की उम्मीद में राह-ए-मय को छोड़ दिया
मयखाने का क्या कहे,है घर में जहर और भी खराब।
निकल जाते हैं खंजर दफन हो जाती है जिन्दगीयां
इस जमीन का रंग भी खुं से हो गयी और भी खराब।
सोंचा था तेरे देश में महंगी होगी ये जिन्दगी
मगर जिन्दगी का भाव वहां और भी खराब।
जिते नहीं अपनी जिंदगी आती नहीं शुकुन की मौत
हालात हो रही अनुराग की पहले से और भी खराब।
©anuragrahi
S