मेरे शहर का सूरज
देखा है मैंने इसे पहले भी कई बार,
मेरी खिड़की से गुजरते हुए,
बालकनी से धीरे-धीरे ढलते हुए,
मेरे साथ साथ चलते हुए…
पर आज इसमें बात कुछ और है,
आज इस सूरज के चेहरे की लालिमा कुछ और है।
ये आज से पहले इतना खूबसूरत कभी नहीं लगा,
ढलते हुए भी इतना रोशन कभी नहीं लगा।
आज कुछ अलग सी खुशी है इसके चेहरे पर,
जैसे महसूस हो रहा हो इसे
अपने महबूब से मिलने का सुकून…
इंतज़ार के खत्म होने का एहसास,
चाँद के करीब जाने की एक हल्की सी बेचैनी।
और हो bhi क्यों न—
ये ही तो है जो सदियों से
प्रेम की एक अनकही डोर पकड़े हुए है,
दूर होकर भी हर शाम
एक पल के लिए करीब आते हुए।
वो एक पल का मिलन भी काफी होता है,
अगर दोनों तरफ से
मोहब्बत उतनी ही सच्ची हो…
उतनी ही गहरी, उतनी ही बेपनाह।
सिखा दिया है इसने दुनिया को,
दूर रहकर भी प्रेम करना,
वरना न कभी राधा कृष्ण की कहानी होती,
न ही सूरज और चाँद का ये अनोखा रिश्ता होता।
न धरती आसमान की होती,
न नदियां समंदर की होती…
और शायद—
हम आपके न होते,
और इश्क…
ये दूर होकर भी मुमकिन न होता।
अच्छा बता ना …
क्या तेरे शहर का सूरज भी यूँ ही रहता है?
बेचैन अपने चाँद से मिलन को,
अपने महबूब के दीदार को…
जैसे मैं रहती हूँ तुझे देखने को,
जैसे मेरे शहर का सूरज रहता है
अपने चाँद से मिलने को…
बता ना …
Ink&Emotions
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