मेरे तक्कलुफ का क्या कोई इम्तिहां लेगा
इक उम्मीद पे डुबा था कि कोई बचा लेगा।
कोई खाई भी गहरी नहीं है जितना गम मेरा
फक्र था कि आगोश-ए-सुकून में कोई सुला लेगा।
अपने वफा का सबुत दूं मैं किसके सामने
हर किसी ने कहा था सब्र कर तुझे वो बुला लेगा।
आज हर मौसम मेरे तरफ से मुंह फेर खड़ा है
तुफान जो चलीं है कि जैसे अब मुझे उड़ा लेगा।
किसी गुनाह की सजा तो शायद इतना नहीं होता
लगता है कतार का हर शक्स मुझे आजमा लेगा।
जाया न कर अनुराग सो जा बची-खुची रातों को
क्या पता कब फरिश्ते मौत के आकार जगा लेगा।
©anuragrahi
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