मेरे तन्हाई में आवाज दे कोई
गर्दिश-ए-वक्त से रिहा दे कोई।
हम भी प्यार के ही इक फुल हैं
मुझे भी जिने के लिए सिंच दे कोई।
मेरे ये अश्क नहीं मोतियों के बुंद है
इन्हें अपने दामन से पिरो दे कोई।
जमाने बदले मौसम बदला न बदला नसीब
मेरे चमन-ए-दिल को सब्ज बना दे कोई।
मौत का डर जाने क्यूं आने लगा है अब
थामकर हांथों को ये डर मिटा दे कोई।
मैं अपने किन किन गुनाहों पर पर्दा डालूँ अनुराग
ऐसा मिले हमसफ़र जो गुनाह भुला दे कोई।
©anuragrahi
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