मेरे माथे के लकिरों में मेरी गरिबी झलकती हैं,
मगर मेरे लिबास में लोगों को मेरी अमिरी झलकती है।
कैसे उम्मीद करूं किसी से कुछ पाने को अब,
जब परवरदिगार को भी अपनी मजबुरि झलकती हैं।
कोशिशें बहुत की हमने इन लकिरों को मिटाने की,
हर वो काम किया जो करना था अपनी गरिबी हटाने की।
समन्दर-ए-मुफलिसी में ऐसे डुबा दुर तक साहिल नहीं दिखती हैं,
निगाहों में बस अब आब-ए-चश्म ही झलकती है।
©anuragrahi
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