मेरी झुठी तहरीर पर कोई इजारा क्या देगा
ताबीर जब मेरी है कोई सहारा क्या देगा।
दरिया में शज़र ही गर बहते जा रहे हो
फिर चिंटी को कोई पता किनारा क्या देगा।
मेरे मुट्ठी में रेत भी नहीं वक्त बिता पा रहा
मुझे किस्मत भी बेचारा क्या देगा।
वो जख़्म दे के मुझे हौसला भी देता है
इससे ज्यादा कोई प्यार का इशारा क्या देगा।
जो खुद ही बख्त-ए-खु़फ्ता हो अनुराग
वो बदन-दुरीदा किसी को गुजारा क्या देगा।
©anuragrahi
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