मेरी जिन्दगी में भी उजाला कुछ तो हो
जिने के लिए घर में निवाला कुछ तो हो।
शुक्रगुजार हूं खुदा का जो मिली ऐसी जिंदगी
मुफलिसी में भिड़ से मेरे तरफ़ देखने वाला कुछ तो हो।
अंजान रास्ते मंजिल तक कभी नहीं ले जाते
रास्तों में एहतियातन जाना-पहचाना कुछ तो हो।
भला मैं कौन हूं,किस धर्म का हूं कोई कैसे पहचाने
मेरा भी रब,गॉड,भगवान या खुदा कुछ तो हो।
अनुराग आज मैं प्रकृति के बनाए हर चिंजों को निहारा
जरा पता लगाओ शायद उसका भी धर्म कुछ तो हो।
©anuragrahi
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