V

मेरी कहानी

सबको बस अपनी पड़ी है
मेरी कौन है सोचता,
सबकी दुनिया तो चल रही
और, मैं बुत सी बनी।
सांसे ले रही हूं, धड़कन भी है चल रही,
फिर भी कमबख्त ज़िंदगी,
बहुत दूर है चल रही।
कसूर तेरा नहीं मेरा है,
मुझे मालूम है, मैं ग़लत हूं।
मगर,
सही थीं तो कब खुश थी,
सब कुछ करके भी दुखी रही
ना कल तुम थे ना आज हो
कल भी अकेली रोई थी,
आज भी आंसू बह रहे।
सबकी दुनिया चल रही
बस, मैं ही ख़ामोश ठहरी सी।
मेरी कौन है सोचता,
मैं बुत सी बनी खड़ी।
©vandi