मेरी खता गर है तो खता ही सही
मुजरिम-ए-मुहब्बत हूं तो मुजरिम ही सही।
मेरे जुबां से मेरी दास्तां-ए-मुहब्बत सुन लो
मेरे गुनाह का बयां सुनो तो सही।
मेरे संग-ए-साहिल कई बैठें है दरबार में
वो चुप क्यूं है उनकी भी खामोशियां सुनों तो सही।
रंग-ए-जफा लग जाए तो आसां है उतर जाना
दाग़-ए-जफा उतरता नहीं सुनो तो सही।
बनोगे दोस्त तुम भी मेरे दुश्मनों एक दिन
मेरे जिंदगी की आह को सुनो तो सही।
कहोगे वक्त को मुजरिम भरी बहारों में
कैसे जला था अनुराग का घर सुनो तो सही।
©anuragrahi
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