मैं आईना समझ रोज उन्हें देखता हूँ,
मैं खुद का चेहरा उनमे देखता हूँ।
कभी खुश मगर अक्सर गमगिन दिखते है,
जाजिब चेहरे में भी मै बदसूरत दिखता हूँ।
है दरपेश उनके रंग सब फिके जिंदगी के भी,
उनके निगाहों से तो मैं रंगीं दुनिया देखता हूँ।
दार पर खड़ी है हमारी ये बेबस जिंदगी,
फक्र है आंगन में खुद सा नया शजर देखता हूँ।
©anuragrahi
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