पतली सुत के चादर में लिपटी
शरद के क्रुर ठंढ में ठिठुरती मां।
हमे ओढाकर रजाई कंबल मोटे
खुद को सहज समझती मां।
हम तो बस अब परदेशी हो गए
अब भी कई चिज मेरे लिए जतनती मां।
खुद को पुरा दिन भुखा रखकर भी
हर रोज मुझसे हाल चाल है पुछती मां।
हमने बस सिर्फ अपना देखा तुम्हारा नजरअंदाज किया
फिर भी दोनों हाथों से मेरे कुशल की दुआ करती मां।
कई रंगिन फ्रेम में है हमने अपने तस्वीर जरवाए
वही पुरानी फटी एलबम में प्यारी लड़की जैसी मां।
अब न होगा पाप ये आंख खुल गए अब मेरे
पश्चताप के आग में जलकर मौत को गले लगा लूं मां।
मुझसे मां रूस्ट न होना मेरे किए का अवश्य सजा तू देना
जब मैं फिर बालक बन के तेरे गोद में आ जाऊं मां।
©anuragrahi
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