मेरी पहचान है उसके ही ग़म से
खुदा हाफ़िज़ उस बेरहम से।
तौबा मेरी नुमाइश-ओ-जिक्र-ए-शमीम
किया करती थी जो अक्सर हमसे।
आइंदा दिल भी लगाना तो उस से लगाना
जिसको जरूरत हो फकत तुम से।
तलखि-ए-गम न पुछिए हुजूर
मरने वाले हैं हम किसी के ग़म से।
हुस्न जार जार और मैं बेजार हो गया हूं
दर्द मिट जाएगा जिस्म के मरहम से।
कोई परिंदा आए तो अनुराग ख़बर भिजवा दे
कि शुक्रिया आप जो कभी मिले थे हमसे।
©anuragrahi
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