मगर अब नहीं।
“हाँ, मैं ग़ुस्से में थी…
मगर अब ये ग़ुस्सा भी इबादत की तरह ख़ामोश रहेगा।
क्योंकि ग़ुस्सा उसी पर होता है
जहाँ हक़ बाक़ी हो —
और मैंने अपना हक़ तुम्हारी चौखट से उठा लिया है।”
रूठना उनसे होता है
जो मनाने की नीयत रखते हों।
आँसू उनके सामने बहते हैं
जो उन्हें दुआ की तरह थाम लें।
तुम न दुआ बने,
न सहारा,
न वजह-ए-सुकून…
और मैं?
मैं हर बार टूट कर भी
सजदे की तरह झुक कर
खुद को समेटती रही।
आँसूओं को वुज़ू बना कर
मुस्कान की नमाज़ पढ़ती रही।
सिर्फ तुम्हारी एक झलक की तलब में,
सिर्फ दो लम्हों की रौशनी के लिए
मैंने अपनी तमाम रातों का चैन क़ुर्बान कर दिया।
सोचा —
रूठ गई तो
जो क़तरा-भर वक़्त मिलता है,
वो भी सूख जाएगा।
इसलिए हर दफ़ा
मैंने अपने ही दिल को समझा लिया।
मगर अब नहीं।
अब इंतज़ार इबादत नहीं —
मेरी रूह की तौहीन लगेगा।
मेरी पलकों अब किसी की राह में सजदा नहीं करेंगी।
मेरी राह अब मेरी अपनी तलाश होगी।
अब मैं भी जिऊँगी —
रूह की आज़ादी के साथ।
अब मैं भी सुकून की नींद सोऊँगी,
अपने ख़्वाबों को किसी की यादों की क़ब्र में दफ़्न नहीं करूँगी।
मोहब्बत कम न होगी —
क्योंकि वो मेरी रूह की सरिश्त में है।
मगर अब वो मोहब्बत
सिर्फ तुम्हारे नाम की ज़ंजीर न रहेगी।
अब मैं खुद से भी मोहब्बत करूँगी —
उसी पाकीज़गी, उसी शिद्दत के साथ
जिससे कभी तुम्हें चाहा था।
मैं जा रही हूँ…
न शिकवे में, न ग़ुस्से में —
बल्कि अपनी रूह की तरफ़ लौट रही हूँ।
अब मेरी मुस्कुराहट किसी की मेहरबानी नहीं,
मेरा सुकून किसी की मौजूदगी का मोहताज नहीं।
तुम दास्तान का हिस्सा रहोगे —
मगर मेरी तक़दीर का मरकज़ नहीं।
मैं बिखरी तो थी,
मगर मिट्टी नहीं थी —
फिर से उठ खड़ी होऊँगी।
अब सच ये है —
मैं जा नहीं रही तुमसे,
मैं लौट रही हूँ…
अपने पास।
और जो खुद तक पहुँच जाए —
उसे फिर किसी और की तलाश नहीं रहती। ✨
-शिवन्या
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