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महामारी में मौत

क्या कुसूर था उसका ,
जो लोग उसे छूने से डरते हैं
आज हर व्यक्ति उसके द्वार पर खड़ा है
वहीं एक व्यक्ति दस्ताने बांटने में पड़ा है
कुछ लोग अपने घरों से झांक रहे है
कुछ तो अपनी दुकानें संभाल रहे हैं
माना इस महामारी में भी लोग दुख बंट रहे हैं
जहां कुछ लोग उसकी अर्थी उठा रहे हैं
अर्थी तो उठ गई,
दुकानें भी खुल गई
घरों से झांक रहे लोग ,अभी भी पास नहीं आए
उन्हें डर कि कहीं उन्हें, कोरोना ना हो जाए
इकठ्ठा हुई भीड़ भी कम हो रही है
ना जाने लोगो में कोरोना का डर है ,या इंसानियत कम हो रही है
कुछ जीने का उसूल था उसका,
जो लोग आज उसे रटते है
क्या कुसूर था उसका ,
जो लोग उसे छूने से डरते हैं
©hakuna