महफूज़ नहीं मुहब्बत का ठिकाना यहाँ
बेकार है यारों दिल लगाना यहाँ।
चेहरे पे चमकती जिन्हें जितनी रानाईयाँ है
रोज़ लिखते वो ही नए अफसाना यहाँ।
जिन गुलों में बू-ए-मुहब्बत ही नहीं
उसी का अब बस है जमाना यहाँ।
शाम ढलते जुगनुओं की है मंडली चली
जाने किस किस को करना है दिवाना यहाँ।
आस्मां से जब कोई देखने की कोशिश करे
घर अपना भी लगेगा बेगाना यहाँ।
गिले-शिकवे अनुराग के जेहन में है आज बहुत
छोड़ो किसी से कुछ न कहना न हैं अब बताना यहाँ।
©anuragrahi
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