मिलेंगे क्या वो जिनकी रूखसत हो गई
जिने के लिए गम की जरूरत हो गई।
मुद्दतों से रह रहे थे जो हम साथ साथ
दर्द को इस दिल से मुहब्बत हो गई।
है गहरा जख्म इस खाना-ऎ-दिल में
जिसपे था जां निसार उसी से फुरकत हो गई।
बहार क्या है अब बेमुराद बेरूह जिस्म को
खत्म जिन्दगी में अब इशरत हो गई।
कर के हलाक सैकड़ों तमन्नाओं को दिल में
आज पहली बार खुदा मेरे तुझसे वहशत हो गई।
लिखने के पहले ही नसीब से तुने मिटा डाला
देख लो जमाने वाले अनुराग पर ये अजियत हो गई।
रूखसत - विदाई, खाना-ऎ-दिल-:दिल का एक कोना,फुरकत-जुदाई,इशरत-खुशी, हलाक -नष्ट,वहशत-घृणा,अजियत-जुल्म ढाना
©anuragrahi
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