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mirza galib

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो 
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो 
बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए 
कोई हम-साया न हो और पासबाँ कोई न हो 
पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार 
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वाँ कोई न हो
©aaryansing