V

मन

मन एक अबूझ पहेली सा है
भीड़ में अकेला
और
अकेलेपन में भीड़ से भर जाता है
कभी कभी निन्यानवे के चक्कर में पड़ेगा
कभी बिना कुछ ही खुश हो जाता है
वैसे  बकबक करता रहता है
अनवरत
सोने भी नहीं देता
पर कुछ लिखने  कोशिश करो
तो सब बिसरा सा  जाता है
समझ नहीं आता
यह बस मेरा हाल है
या, सभी के साथ ऐसा हो जाता है
कौन इसे समझाए
जितना  कुछ पकड़ पाओ तो सोना है
वरना  सब मिटटी हो जाता है.
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©vikasgarg